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मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

याद रहेगा वो सफ़र भी

दिसम्बर की छुट्टियों में और मम्मी अपने मामा के रहने गए थे और रविवार को हमें को वापस आना थाजैसे ही हम स्टेशन पर पहुचे और वहा का माहोल दाखा तो पाया की रेवाडी से देल्ही १०:३० वाली गाड़ी ४-५ घंटे देर से आयेगी (कोहरे के कारण)खेर थोडी देर अपने मोसी का घर पास में होने के कारण हम वहा रुक गए और फिर २ बजे वाली गाड़ी से अपने घर की और निकल पड़े इस से पहेले भी बहुत सी गाडिया जा चुकी थी जिस कारण हमरी गाड़ी लगभग खाली थी खास का की हमारी बोगी धीरे -धीरे सभी यात्री देल्ही कैंट तक उतर चुके थे अब हमारे डिबबे में मम्मी और में और १ आदमी था और क्योकि यह गाड़ी सराए के बाद पुल बंगश के बीच उजाड़ झुगियो के पास जरुर रूकती है इसलिए उस दिन भी कम से कम २० मिनट तक यह वहा रुकी और यह २० मिनट मेरे और मम्मी के लिए बहुत भरी हो गए थे क्योकि इसी बीच डिब्बे में एक शारबी चढ़ आया और गन्दी गन्दी गलिया देने लगा उस से डर कर हम थोड़े पीछे की तरफ़ चले गए और पाया की वहा भी कोई नही था अब हम और डर चुके थे क्योकि हमने गहने भी पहने थे और काफी समान भी था हमारे पास और उस एक आदमी की वजह से हम गेट भी बंद नही कर पा रहे थे और थोडी देर में व्हो एक आदमी जो पहेले से हमरे साथ था वो भी शराबी की वजह से हमरे ही डिब्बे में आ गया था तब मम्मी ने उनसे बात की तो पाया उन्होंने कहा की बहनजी आप चिंता न करो और दरो मत यह कुछ नही करेगा हम भी तो है यहाँ तब मम्मी को कुछ होसला आया और फिर थोडी ही देर में ट्रेन भी चल दी तब उस आदमी ने पहले हमें उतारा और फिर ख़ुद उत्तरा इस जल्दी बाजी में हम उनका शुक्रिया करना भी भूल गए और अपने घर की और चल दिए
आज की दुनिया में भी अच्छे लोगो की कमी नही है इसलिए हमेशा उपर वाले पर भरोसा रखना चाहिए और इस पत्र के जरिये हम उस अनजान व्यक्ति का भी धन्यवाद कहते है