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गुरुवार, 17 जनवरी 2008

कहा तक उचित ...............?

यह तो सब जानते है, कि देहली में कॉमन वेल्थ गेम के लिए बहुत कार्य किया जा रहा है जिन कार्यो में सीलिंग ,यमुना के खादर बांगर के स्थान पर नए निर्माण तथा और भी बहुत से कार्य शामिल है ,जिसके चलते बहुत से लोगो को भी भरी नुकसान उठाना पड़ा माना कि बाहर से लोग आयेगे तो सजावट भी जरुरी है पर इस का मतलब यह तो नही की अपने लोगो को नुकसान उठाना पड़े
यदि देखा जाये तो जब हमारे घर में महेमान आते है तो घर हम आप भी सजाते है , पर इस का मतलब यह तो नही कि घर को तोड़ कर नया घर बनाते है देहली का दिल कहे जाने वाले चांदनी चोव्क जैसी जगहें कि असली खूबसूरती को, जायके को वहा से हटाना कहा तक उचित है देअल्ही को बदल कर विदेशी तर्ज़ पर बसना कहा तक देअल्हिवासियो के हक में है ?

मंगलवार, 8 जनवरी 2008

चिट्टी का गुम होता अस्तित्व

संचार मानव जीवन का आधार है और मानव ने अपने आप को अभिव्यक्त करने के लिए अनेको माध्यमो का सहारा लिया जिनमें से एक थी पाती पाती यानी चिट्टी मतलब अन्तेर्देशीय पत्र या इनलैंड लेटर लेकिन ,आज इस तकनीकी युग में पाती कि कब्र पर अनेको नए संचार के साधन उग आये है ,जिनका हम जमकर इस्तेमाल ओर दोहन कर रहे है आज के इस आपाधापी के युग में लोगो में संवेदन शीलता एवम भावनाओ की कमी होती जा रही हैक्यो आज चिट्टी व्यावसायिक गतिविधियों के संचार के साधन मात्र में रह गयी है ?अपनेपन का एहसास कराने वाली चिट्टी का अस्तित्व क्यो खतम होता जा रहा है? इन सब के पीछेको कोण से तत्व प्रभावी हो रहे है ? यदि गोंर किया जाये तो हम पाते है कि चिट्टी के अस्तित्वसबसे अधिक खतरा पहुचाने में तकनीकी ने अपनी भूमिका निभायी है आगे दोड पीछे छोड़ के होड़ में आज हम लगातार विकास की राह पर अग्रसर है और इस रह की मंजिल नयी-नयी तकनीको से होकर जाती है और इन्ही नयी तकनीको को अपनाते हुए हम बहुत सी चीजो को पीछे छोड़ते हुए आगे बडे जाते है हमारे बडे कदम यह भूल जाते है कि हमने क्या khoya और क्या पाया ऐसा ही कुछ हाल हमें संचार में भी deakhne को मिलता हैएक और जन्हा पहले कबूतरों को और फिर डाकिया को संचार का सशक्त माध्यम माना जाता था वह माध्यम तकनीक कि इस आंधी में कही गुम हो गए है ,और आज उन कि जगहें कंप्युटर ,मोबाइल ,फैक्स ने ले lie है जैसे कि कहा जाता है कि कोई भी नयी चीज आने पर परिवर्तन होना भी आवश्क है ,इसलिए यदि गोर किया जाये तो हम पाते है कि तकनीक सदैव ही अपने संग कुछ गुण और दोष लाती है संचार किरांति के इस युग में आज जगहें -जगहें टेलीफोन बूथ दिख जायगे ,जहा से आप कुछ ही मिनटो में अपने परिचित से सीधे बात कर सकते है चिट्ठियों की तरह न लिखने का झंझट न भेज ने की चिंता बस फ़ोन घुमाया और हो गयी बात ,और रही सही कसर मोबाइल फ़ोन आने पर पूरी हो गयी आज मोबाइल कल्चर जितनी तेजी से हावी होता जा रह है वह आश्चर्यजनक है यानी *कर लो दुनिया मुठी में * पर यह नही पता कि कब लाइन कट जाये और दुनिया हो जाये मुठी से बाहर आज के इस समय में चित्तियो कि जगह इ मेल ने ले ले ,पर जो संवेदनाये ,भवनाये ,प्यार अपनेपन का एहसास पाती कराती थी वो इ मेल नही कराते है आज वे संवेदनाये ,भवनाये ,विचार भी मानव जीवन से खोते जा रहे है जिस चिट्टी को हम सालो -साल सहेज कर रखते थे बार -बार पड़ते थेक्या इ - मेल स्थान ले पा रहे है ?और क्या ले पायेगे ?