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बुधवार, 15 अप्रैल 2009

शिक्षा के मन्दिर में यह कैसा दृश्य

अप्रैल का महिना है और विद्यालयो में प्रवेश प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इन दिनों जब सुबह सुबह समाचार पत्र उठा कर देखो तो उस में अक्सर यही खबर देखने को मिलती है की विद्यालय वाले पूर्ण रूप से अपनी मनमानी पर उत्तरे हुए है और माँ बापों को बहुत सी दिकतो का सामना करना पड़ रहा है और शिक्षा निदेशालेये में भी परेंट्स की शिकायतों का अम्बार लगा हुआ है और यहाँ तक की निदेशालेये ने कई विद्यालयो के प्रति कड़े कदम भी उठए है यह सब पड़ कर आप को लग रहा होगा की यह तो आम बात है और विद्यालय वाले तो होते ही ऐसे है पर एक बात हमेशा ध्यान में रखनी चाइए की ताली कभी भी एक हाथ से नही बजती

आज जब सुबह सुबह में एक स्कूल में गई तो पाया की वहा के प्रिंसिपल और किसी परेंट्स के बीच कुछ कहा सुनी हो रही थी और धीरे धीरे बात यहाँ तक बढ गई की परेंट्स प्रिंसिपल के साथ मार पिटाई करने पर उत्तारु हो गयाऔर जब में ने सारा मामला जन तो पाया की पहेले उस वैयक्ति का बच्चा उस स्कूल में पड़ता था और अब उन के स्कूल से टी.सी. भी प्राप्त कर चुका था पर कही और प्रवेश न मिल पाने के कारन वह वैयक्ति प्रिंसिपल से इस बात पर लड़ रहा था की मेरे बच्चे का नए स्कूल में प्रवेश तुम करा कर दो ,व्हो भी वहा जहा में कहू

आज के समय में सभी माँ बाप अपने बच्चो को अच्छी से अच्छी शिक्षा देना चाहते हैपर शिक्षा के जिस मन्दिर में आप स्वयम इस प्रकार की गति विधिया करेगे जब आप ही एक शिक्षक का निरादर करगे तो आप सोचे की आप अपने आने वाले कल को क्या दे रहे है आप अपने जिस बच्चे को अच्छी शिक्षा देना चाहते है व्हो आप से किस प्रकार की शिक्षा प्राप्त कर रहा है आप अच्छे स्कूल में पड़ा कर अपने बच्चे को अच्छा इन्सान नही बना सकते अच्छा इंसान व्हो तभी बनेगा जब आप उससे अपने घर से ही अच्छी ज्ञान की बाते सिखा रहे हो,और बात रही शिक्षा निदेश्ल्याओ में शियाकतो के दर्ज होने की तो में आशा करती हु की यह समिति कोई भी फ़ैसला एक तरफा नही करे ,क्योकि गलती हमेशा स्कूल वालो की ही नही होती कभी- कभी परेंट्स का भी उतना ही सहयोग होता है

2 टिप्‍पणियां:

  1. Sahi kaha hai aapne, abhibavakon aur prabandhan donon mein taalmel aavashyak hai.

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  2. सही जानिये, तो हम भारतीय शिक्षा का असली मतलब ही भूल चुके हैं। शिक्षा देने के ढाँचे को पूरी तरह बदलना होगा।

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