गुरुवार, 17 सितंबर 2009
पहला एहसास
शनिवार, 30 मई 2009
मुझ में भी है जीवन
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बुधवार, 15 अप्रैल 2009
शिक्षा के मन्दिर में यह कैसा दृश्य
अप्रैल का महिना है और विद्यालयो में प्रवेश प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इन दिनों जब सुबह सुबह समाचार पत्र उठा कर देखो तो उस में अक्सर यही खबर देखने को मिलती है की विद्यालय वाले पूर्ण रूप से अपनी मनमानी पर उत्तरे हुए है और माँ बापों को बहुत सी दिकतो का सामना करना पड़ रहा है और शिक्षा निदेशालेये में भी परेंट्स की शिकायतों का अम्बार लगा हुआ है और यहाँ तक की निदेशालेये ने कई विद्यालयो के प्रति कड़े कदम भी उठए है यह सब पड़ कर आप को लग रहा होगा की यह तो आम बात है और विद्यालय वाले तो होते ही ऐसे है पर एक बात हमेशा ध्यान में रखनी चाइए की ताली कभी भी एक हाथ से नही बजती
आज जब सुबह सुबह में एक स्कूल में गई तो पाया की वहा के प्रिंसिपल और किसी परेंट्स के बीच कुछ कहा सुनी हो रही थी और धीरे धीरे बात यहाँ तक बढ गई की परेंट्स प्रिंसिपल के साथ मार पिटाई करने पर उत्तारु हो गयाऔर जब में ने सारा मामला जन तो पाया की पहेले उस वैयक्ति का बच्चा उस स्कूल में पड़ता था और अब उन के स्कूल से टी.सी. भी प्राप्त कर चुका था पर कही और प्रवेश न मिल पाने के कारन वह वैयक्ति प्रिंसिपल से इस बात पर लड़ रहा था की मेरे बच्चे का नए स्कूल में प्रवेश तुम करा कर दो ,व्हो भी वहा जहा में कहू
आज के समय में सभी माँ बाप अपने बच्चो को अच्छी से अच्छी शिक्षा देना चाहते हैपर शिक्षा के जिस मन्दिर में आप स्वयम इस प्रकार की गति विधिया करेगे जब आप ही एक शिक्षक का निरादर करगे तो आप सोचे की आप अपने आने वाले कल को क्या दे रहे है आप अपने जिस बच्चे को अच्छी शिक्षा देना चाहते है व्हो आप से किस प्रकार की शिक्षा प्राप्त कर रहा है आप अच्छे स्कूल में पड़ा कर अपने बच्चे को अच्छा इन्सान नही बना सकते अच्छा इंसान व्हो तभी बनेगा जब आप उससे अपने घर से ही अच्छी ज्ञान की बाते सिखा रहे हो,और बात रही शिक्षा निदेश्ल्याओ में शियाकतो के दर्ज होने की तो में आशा करती हु की यह समिति कोई भी फ़ैसला एक तरफा नही करे ,क्योकि गलती हमेशा स्कूल वालो की ही नही होती कभी- कभी परेंट्स का भी उतना ही सहयोग होता है
बुधवार, 8 अप्रैल 2009
मैं और मेरे पिताजी
- जब मैं ५ साल का था (इससे पहेले की बातें मुझे याद नही ),तब सोचता था -मेरे पिताजी दुनिया के सबसे स्मार्ट और सबसे ताकतवर इंसान है
- १० साल की उम्र मैं मेंने महसूस किया की मेरे पिताजी हर चीज का ज्ञान रखने वाले और बेहद समझदार भी है
- जब मैं १५ का हुआ तो महसूस करने लगा की मेरे दोस्तों के पापा तो मेरे पिताजी से भी ज्यादा समझदार है
- २० साल की उम्र मैं मैंने पाया की मेरे पिताजी को दुनिया के साथ चलने के लिए कुछ और ज्ञान की जरुरत है
- २५ साल की उम्र मैं मेरी यह सोच बनी की मेरे पिताजी किसी और दुनिया के है और वह नए ज़माने के साथ नही चल सकते
- ३० साल का हुआ तो महसूस किया की मुझे किसी भी काम के बारे मैं उनसे सलाह नही लेनी चाहिए क्योकि उन्हें हर काम मैं नुक्स निकालने की आदत सी पड़ गई है
- ३५ साल की उम्र मैं मैंने महसूस किया की आब पिताजी को मेरे तरीके से चलने की समझ आ चुकी है ,इस लिए छोटी- मोटी बातो पर उन की सलाह ली जा सकती है
- जब मैं ४० साल का हुआ तो महसूस किया की कुछ जरुरी mamlo मैं पिताजी की salaha लेना जरुरी है
- ५० साल की उम्र मैं मुझे लगा की पिताजी की सलाह के बिना कुछ नही करना चाहिए ,और १५ साल की उम्र के बाद की मेरी धर्नाये ग़लत थीअब मेरे बच्चे बड़े हो चुके थे परन्तु अफ़सोस ,इससे पहेले की mein apne is faisle par amal kar pata, mere पिताजी इस संसार को अलविदा कहे गए और मैं उनकी हर सलाह व तजुर्बे से वंचित रहे गया
- बेटा समझता है ,बाप बनने के बाद !
- बेटी समझती है, माँ बनने के बाद !
- बहु समझती है ,सास बनने के बाद !
यह सब मैंने एक समाचार पत्र मैं पढ़ा और चाह कि आप के साथ शेयर करू और unka bhi shukriya करू जिस ने इतना अच्छा लेख लिखा
मंगलवार, 10 मार्च 2009
उडा ले गए सिर से छत भी

रविवार, 8 मार्च 2009
रंगों की दुनिया

त्यौहार कोई भी क्यो न हो सभी के चहेरे पर एक खुशी ला देता है
और खास कर की रंगों का त्यौहार होली तो आने से पहेले ही आदमी को मस्ती के माहोल में ढलने को प्रेरित करता है फिर चाहे कोई छोटा हो या बड़ा रंग सभी को अपनी और आकर्षित करते है यही वो पल होते है जब इंसान अपने सभी गिले शिकवे मिटा कर सभी को एक ही रंग में रंग लेता है और रंगोंकी मस्ती में सराबोर हो कर सभी गमो को भुला कर , अपनी भागती दोड़ती जिन्दगी में से कुछ पल पुरे आनंद के साथ जीता है
मैंआप सभी को होली की बहुत बहुत शुब्कामनाए देती हु और आशा करती हु की आप सभी की होली मंगलमय हो
मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009
याद रहेगा वो सफ़र भी
आज की दुनिया में भी अच्छे लोगो की कमी नही है इसलिए हमेशा उपर वाले पर भरोसा रखना चाहिए और इस पत्र के जरिये हम उस अनजान व्यक्ति का भी धन्यवाद कहते है
गुरुवार, 29 जनवरी 2009
सरनेम की माया
शनिवार, 17 जनवरी 2009
बाल विवाह

